10 दिसंबर 1962 को, सैन्य अकादमी की स्थापना के ठीक तीस साल बाद, भारत गणराज्य के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने विभिन्न युद्धों और अभियानों में अपने पूर्व छात्रों की वीरतापूर्ण सेवाओं की मान्यता देते करते हुए भारतीय सैन्य अकादमी को नए ध्वज प्रदान किए। राष्ट्रपति ने टिप्पणी की, "आप पर एक बड़ी जिम्मेदारी है। हमारे देश की रक्षा,
सुरक्षा, सम्मान, स्वाभिमान और प्रतिष्ठा आपका मुख्य सरोकार है। हमें सुशस्त्र, कुशल और बुद्धिमान होना होगा ।" इस प्रकार 10 दिसंबर 1962 को 30वीं और 31वीं नियमित, 15वीं और 16वीं एनसीसी और 16वीं और 17वीं तकनीकी पाठ्यक्रमों की पासिंग-आउट-परेड को एक ऐतिहासिक महत्व के साथ आयोजित किया गया । 1950 में भारत के गणतंत्र बनने से एक दिन पहले अकादमी के किंग्स क्लर्स की स्थापना के साथ जो शून्य पैदा हुआ था, वह इस प्रकार भर गया।
1963 में, अकादमी की गतिविधियों में अचानक तेजी आई । 1962 में चीनी आक्रमण के बाद, रेगुलर पाठ्यक्रमों के लिए प्रशिक्षण की अवधि कम कर दी गई और आपातकालीन कोर्स चलाए गए। रांगडवाला (दक्षिण परिसर) क्षेत्र तथा टोंस नदी (उत्तर परिसर) के तट पर जैन्टलमैन कैडेटों के रहने के लिए नए आवास बनाए गए । अगस्त 1964 में, आपातकालीन कोर्स बंद कर दिए गए और रेगुलर पाठ्यक्रम फिर से शुरू कर दिए गए । अंतिम आपातकालीन कोर्स 01 नवंबर 1964 को पास-आउट हुआ। 01 नवंबर 1964 तक 3903 नए कैडेटों को आपातकालीन कमीशन प्रदान किया गया।
1974 में, जीसी के प्रवेश स्तर को स्नातक डिग्री तक बढ़ा दिया गया और डायरेक्ट एन्ट्री के लिए प्रशिक्षण की अवधि दो साल से घटाकर डेढ़ साल कर दी गई । 1976 में, भारतीय सैन्य अकादमी की चार बटालियनों के नाम बदलकर क्रमशः करिअप्पा बटालियन, थिमैय्या
बटालियन, मानेकशॉ बटालियन और भगत बटालियन कर दिए गए, जिनमें से प्रत्येक में दो कंपनियां थीं।
15 दिसंबर 1976 को, भारत के पांचवें राष्ट्रपति, श्री फखरुद्दीन अली अहमद ने शांति और युद्धकाल में राष्ट्र के लिए की गई सराहनीय सेवाओं को मान्यता देते हुए भारतीय सैन्य अकादमी को नए ध्वज प्रदान किए। उन्हें वरिष्ठ अवर अधिकारी डीएस हुड्डा के कक्ष में रखते हुए, राष्ट्रपति ने टिप्पणी की, "मुझे आशा है कि ध्वज आपको अपने देश के कल्याण और सुरक्षा के उद्देश्य के लिए ताकत और लचीलापन रखने के लिए प्रेरित करेंगे। मुझे यकीन है कि आप इन परंपराओं को बनाए रखेंगे और ध्वज को शाश्वत रखोगे । "
1977 में किचनर कॉलेज, नौगांव के घटक, आर्मी कैडेट्स कॉलेज (एसीसी) को पुणे से आईएमए, देहरादून में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां यह आईएमए के फीडर विंग के रूप में कार्य कर रहा है।
1980 में, समादेशक की नियुक्ति को लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर अपग्रेड किया गया और लेफ्टिनेंट जनरल एम थॉमस, एवीएसएम, वीएसएम ने दिसंबर 1980 में इस रैंक में पहले कमांडेंट के रूप में पदभार संभाला। जुलाई 1982 में डिप्टी कमांडेंट और चीफ इंस्ट्रक्टर की नियुक्ति को मेजर जनरल के पद पर भी अपग्रेड किया गया । बाद में, कमांडर एसीसी विंग और शैक्षणिक विभाग के प्रमुख की नियुक्तियों को ब्रिगेडियर के पद पर अपग्रेड किया गया।
वास्तव में, 10 दिसंबर 1932 से 10 दिसंबर 1982 तक व ब्रिगेडियर एल.पी. कॉलिन्स से लेकर लेफ्टिनेंट जनरल मैथ्यू थॉमस तक 50 वर्षों का यह सफर भारतीय सैन्य अकादमी के लिए परिश्रम और गौरव की यात्रा थी। उन पायनियर जैन्टलमैन कैडेटों में से कुछ, जिन्होंने भारत के तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ सर फिलिप चैटवुड के निरीक्षण में कमीशन प्राप्त किया था, वो स्वर्ण जयंती समारोह में अपनी मातृ-सदृशा अकादमी को श्रद्धांजलि देने आए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा निरीक्षित 500 जेंटलमैन कैडेटों की स्वर्ण जयंती परेड को उन्होंने गर्व के साथ देखा। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अकादमी की अपनी यात्रा के दौरान भारतीय सैन्य अकादमी की पर्वतारोहण टीम को झंडी दिखाकर रवाना किया।
1982 में माउंट कामेट (25,447 फीट) और माउंट अबी गामिन (24,130 फीट) के लिए आईएमए पर्वतारोहण का अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया गया था। टीम का नेतृत्व ब्रिगेडियर जगजीत सिंह, एवीएसएम**, वीएसएम ने किया, जिसे कैप्टन भूपिंदर सिंह और कैप्टन डीबी थापा का सहयोग प्राप्त था।
एक भव्य समारोह में पूर्वी कमान के तत्कालीन जीओसी-इन-चीफ और ढाका अभियान के नायक लेफ्टिनेंट जनरल जे एस अरोड़ा, पीवीएसएम (सेवानिवृत्त) ने लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाज़ी (कमांडर, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) की आत्मसमर्पण की गई व्यक्तिगत पिस्तौल 9 दिसंबर 1982 को अकादमी के संग्रहालय में सुरक्षित रखने के लिए भारतीय सैन्य अकादमी को भेंट की।