द्वितीय विश्व युद्ध के फैलने तक अकादमी की क्षमता प्रति सत्र तथा प्रति बैच 40 जैन्टलमैन कैडेट पर स्थिर रही। द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व, अकादमी का बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षण सुविधाएं उत्तर और दक्षिण परिसर मे स्थापित हो गईं । इसके अलावा, अकादमी ने भावी पीढ़ी के लिए संस्थागत रीति-रिवाजों और परंपराओं का निर्माण किया।
18 नवंबर 1934 को, पहला कोर्स समाप्त होने से पहले ही, तत्कालीन वायसराय, महामहिम लॉर्ड विलिंगडन ने महामहिम सम्राट की ओर से अकादमी को किंग्स कलर्स और बैनर प्रदान किए । ये न केवल शाही अनुग्रह द्योतक थे वरन भारतीयों के बलिदान और प्रयासों को मान्यता प्रदान करने के प्रतीक थे। किंग जॉर्ज पंचम द्वारा प्रदान किए गए बैनर ने वायसराय के बैनर को प्रतिस्थापित किया जिसने चैंपियन कंपनी को दिए जाने वाले बैनर का रूप लिया। चैंपियन कंपनी का निर्णय ड्रिल, पीटी, घुड़सवारी, तैराकी और मुक्केबाजी में प्रदर्शन के आधार पर किया गया, जबकि वायसराय के बैनर को हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, एथलेटिक्स, क्रॉस-कंट्री जैसे खेल आयोजनों में उत्कृष्टता को सम्मानित करने के लिए दिया जाने लगा । 22 दिसंबर 1934 को 40 में से 29 जेंटलमैन कैडेट पास आउट हो गए और उन्हें पायनियर कहा गया। पहले कोर्स की पासिंग आउट परेड की कमान अंडर ऑफिसर जीसी स्मिथ डन ने संभाली।
द्वितीय विश्व युद्ध की उभरती वास्तविकताओं के परिणामस्वरूप, अकादमी ने प्रवेशार्थियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि के साथ-साथ उनकी श्रेणियों में परिवर्तन किया गया । यहां तक कि स्थायी भारतीय कमीशन के लिए अधिकारियों के प्रशिक्षण की अवधि को भी छह महीने कर दिया गया । यह नई परिस्थितियों की मांग थी । इन परिवर्तनों के होने से पहले, अकादमी से 16 नियमित पाठ्यक्रम पास-आउट हो चुके थे जबकि दिसंबर 1934 और मई 1941 के बीच सेना में 524 जेंटलमैन कैडेटों को कमीशन दिया गया था तथा अगस्त 1941 और जनवरी 1946 के बीच संख्या तेजी से बढ़कर 3887 हो गई। अकादमी के विस्तार-कार्यक्रम से अकादमी के चरित्र और भूमिका में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला दिए । बढ़ी हुई जेंटलमैन कैडेटों और अधिकारियों की संख्या को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त भूमि का अधिग्रहण किया गया और बड़ी संख्या में अस्थायी संरचनाएं बनाई गईं, जिनमें से कुछ दिलचस्प रूप से आज तक उपयोग की जा रही हैं। अकादमी के कुछ हिस्से, जिन्हें ईस्ट ब्लॉक और वेस्ट ब्लॉक के नाम से जाना जाता है, उन प्रारंभिक वर्षों के हैं। बाद में, अकादमी के पहले दो समादेशक - ब्रिगेडियर कॉलिन्स और ब्रिगेडियर किंग्सले के सम्मान एवं स्मृति में ईस्ट ब्लॉक का नाम बदलकर कोलिन्स ब्लॉक और वेस्ट ब्लॉक को किंग्सले ब्लॉक कर दिया गया।
14 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया। सेकेण्ड-लेफ्टिनेंट पी.एस. भगत, द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय-कमीशन प्राप्त अधिकारी के रूप में विक्टोरिया क्रॉस के पहले प्राप्तकर्ता बने। अकादमी का स्वरूप अपने पूर्व-विश्व युद्धों के सरोकारों से जुड़ा हुआ है । पहले नियमित युद्धोत्तर पाठ्यक्रम के प्रशिक्षण की शुरुआत 25 फरवरी 1946 से हुई।
मई 1947 में अकादमी को, स्वतंत्रता आंदोलन के दो अग्रदूतों पंडित जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की अगवानी करने का सौभाग्य मिला। उनकी इस ऐतिहासिक यात्रा ने अधिकारियों और कैडेटों में देशभक्ति का जोश भर दिया।
युद्ध के बादल छंटने ही वाले थे और अकादमी मजबूत होने की तैयारी कर रही थी, भारत को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया । इस कारण ब्रिटेन और पाकिस्तान के प्रशिक्षकों और जेंटलमैन
कैडेटों काअचानक प्रस्थान हो गया। देश की स्थिति में इस महत्वपूर्ण और मौलिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप, भारतीय सैन्य अकादमी के स्वरूप आमूल-चूल परिवर्तन हुआ। एक नई भूमिका के लिए खुद को पुनर्गठित करने के लिए अकादमी को सघन उत्तरदायित्व का निर्वहन करना पड़ा। इसी क्रम में, अकादमी की कमान ब्रिगेडियर ठाकुर महादेव सिंह, डीएसओ ने पहले भारतीय समादेशक के रूप में संभाली।
स्वतंत्रता के समय, अकादमी की संपत्ति को भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित किया गया था। जेंटलमैन कैडेट्स, जो उन क्षेत्रों से संबंधित थे जो पाकिस्तान का हिस्सा बन गए और जिन्होंने पाकिस्तान जाने का विकल्प चुना, ने 14 अक्टूबर 1947 की रात को अकादमी छोड़ दी। वास्तव में, पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों की पहली दो पीढ़ियां भारतीय सैन्य
अकादमी से पास-आउट हुए थे। नवंबर 1947 में, लॉर्ड एंड लेडी माउंटबेटन ने अकादमी के एकीकरण की देखरेख करने के लिए अकादमी का दौरा किया।