आजादी के बाद पहला युद्ध पाकिस्तान ने किया था। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने आदिवासियों के कंधों पर बंदूक रख दी और कश्मीर पर हमला कर दिया। भारतीय सैन्य अकादमी के पूर्व-प्रशिक्षु मेजर सोमनाथ शर्मा ने भारतीय सेना के इतिहास में साहस की अभूतपूर्व मिसाल कायम की। उन्हें सर्वोच्च वीरता पदक और भारत के पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1948 मेंअकादमी के गौरवशाली इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की। स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल एच सी राजगोपालाचारी ने 09 अक्टूबर 1948 को अकादमी का दौरा किया।
प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 09 दिसंबर 1948 को प्रथम विश्वविद्यालय स्नातक पाठ्यक्रम की पासिंग आउट परेड की समीक्षा की।
द्वितीय विश्व युद्ध की घटनाओं ने जता दिया कि एक निर्णायक सैन्य-जीत पूरी तरह से तीनों सेनाओं की परस्पर निर्भरता और समन्वित प्रयासों पर निर्भर है। इसे ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने दो साल के लिए एक छत के नीचे सेना, नौसेना और वायु सेना के कैडेटों के प्रशिक्षण के लिए देहरादून में एक इंटर सर्विसेज विंग के निर्माण को मंजूरी दी। यह दिन, भारतीय सैन्य अकादमी के लिए एक खास दिन था । एक विशेष आदेश द्वारा, 31 दिसंबर 1948 को भारतीय सैन्य अकादमी का नाम बदलकर सशस्त्र बल अकादमी कर दिया गया। इसके बाद, कैडेटों को आगे के प्रशिक्षण और कमीशनिंग के लिए तीनों सेवाओं के संगत प्री कमीशन प्रशिक्षण प्रतिष्ठानों में जाना था। इस प्रकार, जनवरी 1949 में, अकादमी का नाम बदलकर सशस्त्र सेना अकादमी कर दिया गया, जिसमें वर्तमान में सेना-विंग प्रेम नगर स्थित परिसर में है और इंटर सर्विसेज विंग, क्लेमेंट टाउन में है। भारतीय सैन्य अकादमी के समादेशक का पद ब्रिगेडियर से अपग्रेड करके मेजर जनरल कर दिया गया। 01 जनवरी 1949 को, ब्रिगेडियर ठाकुर महादेव सिंह, डीएसओ को देहरादून में संयुक्त सेवा विंग के समादेशक के रूप में पद ग्रहण करने के लिए मेजर जनरल के पद पर पदोन्नत किया गया था। पहले भारतीय समादेशक के नाम पर जनरल महादेव सिंह (जीएमएस) मार्ग के नाम से जानी जाने वाली एक नई सड़क का निर्माण दो परिसरों को जोड़ने के लिए किया गया था।
01 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के साथ-साथ, सशस्त्र बल अकादमी का नाम राष्ट्रीय रक्षा अकादमी कर दिया गया । पहला ज्वांईंट सर्विसेज विंग का कोर्स दिसंबर 1950 में पास-आउट हुआ। मेजर जनरल के एस थिमैय्या, डी एस ओ ने 1950 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, देहरादून की कमान संभाली।
1954 में भारतीय सेना के लिए एक नए युग की शुरुआत हुई। अंतत: 07 दिसंबर 1954 को, ज्वांईंट सर्विसेज विंग को स्थायी रूप से खडकवासला, पुणे में स्थानांतरित कर दिया गया । औपचारिक रूप से कमीशन होने पर इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी कर दिया गया। 10 दिसंबर 1957 को अकादमी ने रजत जयंती मनाई, जिसमें बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त अधिकारियों ने भाग लिया। ज्वांईंट सर्विसेज विंग के खड़कवासला में स्थानांतरित होने के साथ ही 31 दिसंबर 1957 को देहरादून स्थित मिलिट्री विंग का नाम मिलिट्री कॉलेज कर दिया गया ।
26 जनवरी 1958 को गणतंत्र दिवस परेड के लिए मिलिट्री कॉलेज के 58 जेंटलमैन कैडेटों की एक टुकड़ी भेजी, जिसको विजय चौक से लाल किले, दिल्ली तक मार्च करने का गौरव प्राप्त है ।
01 अक्टूबर 1959 को, लगभग एक दशक के बाद, इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया जब मिलिट्री कॉलेज के पुराने नाम को वापस लाया गया और इसे भारतीय सैन्य अकादमी कहा गया।