भारतीय पूर्वी सेना का इतिहास
पूर्व कमान का इतिहास सन् 1895 से शुरू होता है जब बंगाल प्रेसीडेन्सी आर्मी को समाप्त कर दिया गया । जनरल विस्काउन्ट किचनर के सुधार से शुरू होकर प्रथम विश्व युद्ध तक के दौरान इसको मिलिट्री कमांड का रूप मिला । अधिकारिक रेकार्ड के अनुसार पूर्व कमान की स्थापना 01 नवम्बर1920 में हुई जिसका मुख्यालय गर्मियों में नैनीताल तथा सर्दियों में लखनऊ होता था । जनरल सर एच हडसन, के बी सी, के सी आई ई इसके प्रथम आर्मी कमांडर थे । पूर्व कमान का क्षेत्रधिकार दिल्ली, यू पी, बंगाल, बिहार, ओडिसा और असम तक फैला हुआ था ।
01 जनवरी 1939 में मेरठ, लखनऊ, बंगाल, असम तथा दिल्ली मिलिट्री जिले पूर्व कमान के अंतर्गत आए । सर्दियों का मुख्यालय बरेली स्थानान्तरित हो गया जबकि गर्मियों का मुख्यालय नैनीताल ही रहा । अप्रैल 1942 में कमांड का नामकरण पूर्व आर्मी हो गया तथा इसका मुख्यालय बैरकपुर स्थानान्तरित हो गया ताकि द्वितीय विश्व युद्ध को ठीक से लड़ा जा सके । जापान की श्रेष्ठ सेना के दबाव के कारण इसकी फार्मेशनों को 1500 किमी लम्बी दूरी तय करते हुए मलाया और वर्मा से पीछे हटना पड़ा था ।
जून 1942 में जापानी मार्च को इम्फाल और कोहिमा में रोकने और वर्मा को फिर से जीतने के लिए प्लान बनाया गया । जिसके परिणाम स्वरुप द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी सेना की सबसे बड़ीहार हुई । पूर्व कमान के तहत उस समय 04Xकोर जिसका मुख्यालय इंफाल में था के अधीन 17 और 23 इंडियन डिवीजन तथा 33Xकोर जिसका मुख्यालय अराकॉन में था के अधीन 14 और 26 इंडियन डिवीजन,70 ब्रिटिश डिवीजन तथा 50 इंडियन टैंक ब्रिगेड रिजर्व में था ।
फरवरी 1943 में ब्रिगेडियर आर्डे विन्गेट के नेतृत्व में 77 इंडियन इंफेन्ट्री ब्रिगेड द्वारा वर्मा में प्रथम चिन्डिट आपरेशन किया गया (चिन्डिट नाम पौराणिक कथाओं से लिया गया है जिसमें आधा चिन्टे शेट तथा आधा चील है जिसे इसका फार्मेशन साइन अपनाया गया ) । पूरी फोर्स को एअर लिफ्ट किया गया था ।
अक्टूबर 1943 में 14 इंडियन डिवीजन द्वारा अपनी जापानी सेना के विरूद्ध अराकान्स पर फिर से कब्जा कर लिया था ।
अक्टूबर 1943 में चौदहवीं आर्मी के खड़ी किए जाने के बाद इस्टर्न आर्मी को मेघना नदी (जो आज बंगलादेश में है) के पूर्व तथा वर्मा में ऑपरेशनल जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया तथा पूर्व कमान को ले जनरल अगोम मैन (AGOM Mayne), सी बी, सी बी ई, डी एस ओ, आई डी सी के अधीन पुनः जीवित किया गया और इसका मुख्यालय टॉलीगंज कोलकाता में शिफ्ट किया । इसकी ऑपरेशनल जिम्मेदारी मेघना नदी के पश्चिम में तय की गई । इसके अतिरिक्त कमांड को भारतीय, ब्रिटिश तथा चीनी सैनिकों को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी मिली । अतः रामगढ़ एक बहुत बड़ा ट्रेनिंग सेन्टर बन गया । कमांड ने वर्मा में ऑपरेशन के दौरान प्रशासनिक मदद प्रदान किया । 23 मार्च 1947 में कमान मुख्यालय राँची स्थानान्तरित हुआ और ले जनरल ठाकुर नथु सिंह, पी एस सी इसके पहले भारतीय आर्मी कमांडर बने । मार्च से अगस्त 1947 के बीच देश के बंटवारे के परिणाम-स्वरूप कमांड के फार्मेशनों का भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारा हुआ । केवल 20 और 23 इंफेन्ट्री डिविजन भारत के पास बच गए । कानून और व्यवस्था बनाए रखना कमान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हो गई ।
फरवरी 1955 में कमान मुख्यालय राँची से लखनऊ शिफ्ट हो गया ।
1956 में कमान को नागा विद्रोहियों के विरूद्ध काउन्टर इंसर्जेन्सी ऑपरेशन चलाने की जिम्मेदारी दी गई ।
पूर्व कमान पिछले 45 वर्षों से देश की आंतरिक सुरक्षा संबंधी समस्याओं को समझदारी के साथ किन्तु दृढ़तापूर्वक संभालता रहा है । सेनाएं बेहद कठिन और विपरित परिस्थितियों में कार्य करती रहीं । कई सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया ताकि इन राज्यों में शान्ति बहाल हो सके । हमारे सैनिकों ने इस क्षेत्र के लोगों के लिए बहुत कुछ किया है ।