युद्ध स्मारक

 
वीरता पुरस्कारों एवं युद्ध स्मारकों का सारांश
 
 
वीरता पुरस्कारों का सारांश
 
अभियान
परमवीर चक्र महावीर चक्र वीर चक्र
1947-48
05
48
285
1962 02 08 29
1965 02 26 94
1971 02 27 127
कुल 11 109 535

युद्ध स्मारक

वीर स्मृति (चंडीमंदिर)

वीर स्मृति, पश्चिमी कमान का युद्ध स्मारक, भारतीय सेना की पश्चिमी कमान द्वारा लड़ी गई शानदार लड़ाईयों में शहीद हुए बहादुर सैनिकों के बलिदान की याद दिलाता है। शहीदों के नाम मुख्य स्मारक के साथ-साथ ग्रेनाइट की पृष्ठ भूमि पर भी अंकित किए गए हैं। पश्चिम कमान के सभी परमवीर चक्र विजेताओं की प्रतिमाओं को लॉन के चारों ओर बने चबूतरे पर लगा दिया गया है। इस स्मारक के आस-पास लॉन में ग्रेनाइट की पट्टिकाएं हैं, जो पश्चिम कमान की कुछ ऐतिहासिक लड़ाईयों की मुख्य विशेषताएँ प्रदर्शित करती हैं। विजय दिवस, कमान स्थापना दिवस और अन्य अवसरों पर वीर स्मृति में माल्यार्पण समारोह आयोजित किया जाता है।


डी बी एन युद्ध स्मारक

डेरा बाबा नानक (डी बी एन) युद्ध स्मारक डेरा बाबा नानक के शहर में स्थित है, जो पंजाब के गुरदासपुर जिले में पाकिस्तान के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के पास है। स्मारक 1971 के भारत-पाक युद्ध में डी बी एन ब्रिगेड की जीत के उपलक्ष्य में बनाया गया था। युद्ध के दौरान ब्रिगेड को रावी नदी पर रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण डबल डैकर रेल-रोड ब्रिज पर कब्जा करने का काम सौंपा गया था। ऑपरेशन अकाल नामक ऑपरेशन को सफलतापूर्वत अंजाम दिया गया और फॉर्मेशन को डेरा बाबा नानक के युद्ध सम्मान और तीन महावीर चक्र, सात वीर चक्र, 15 सेना पदक और 14 मेंशन-इन- डिस्पैचेज से सम्मानित किया गया। यह स्मारक 1972 में बनकर तैयार हुआ।


ब्राउनलो का पंजाब युद्ध स्मारक (फिरोज़पुर)

20 वीं डयूक कैम्ब्रिज की अपनी इन्फैन्ट्री (ब्राउनलो के पंजाबियों) का युद्ध स्मारक उन सैनिकों की याद में बनाया गया था, जिन्होंने फ्रांस, मेसोपोटामिया, मिस्त्र, पूर्वी अफ्रीका और भारत की सीमाओं पर महान युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी थी। यह फिरोजपुर में गोल्डन एरो हाऊस क्रॉसिंग पर स्थित है।


सारागढ़ी स्मारक (फिरोजपुर)

सारागढ़ी स्मारक गुरुद्वारा 36 सिख रेजिमेंट के 21 सिख सैनिकों की याद में बनाया गया है, जो 12 सिंतम्बर 1897 को वजीरिस्तान में फोर्ट सारागढ़ी की रक्षा में मर मिटे थे। 36 सिख रेजिमेंट की स्थापना अप्रैल 1887 को कर्नल कुक की कमान में फिरोजपुर में की गई थी। रेजिमेंट को फोर्ट लॉक हार्ड भेजा गया जिसमें सारागढ़ी और गुलिस्तान महत्वपूर्ण चौकियां थीं। 12 सितंबर 1897 की सुबह करीब 10,000 पठानों ने सारागढ़ी को घेर लिया और किले के 1000 गज के दायरे में पोजिशन लेने के बाद गोलियाँ चला दी। उस समय किले में केवल 21 सिख सैनिक मौजूद थे। यह ज्ञात होने के बावजूद कि कोई बलवृद्धि नहीं होगी, इन सैनिकों ने जवाबी कार्रवाई की और बहादूरी से लड़ाई लड़ी। लड़ाई सात घंटे तक जारी रही, जिसके दौरान सिखों ने तेजी से घटती संख्या के बावजूद बहादूरी से लड़ाई लड़ी। आपूर्ति/सप्लाई सीमित थी लेकिन बहादूर सिख सैनिकों ने दुश्मन का प्रतिरोध करना जारी रखा। पठानों ने सिख सैनिकों को आत्मसमर्पण का प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने दुश्मन के सामने घुटने टेकने  की बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। अंत में बहादूर टुकड़ी के नेता हवलदार ईशर सिंह अकेले रह गए। निडर सैनिकों के जत्थे में  इकलौते जीवित हवलदार ईशर सिंह ने अपनी राईफल उठायी और खुद को उस कमरे, जिसमें दुश्मन ने अपना रास्ता बना रखा था, के दरवाजे की दहलीज पर सटाते हुए लड़ाई को लगातार जारी रखा। मरते दम तक  भी, हार न मानते हुए दुश्मन को ललकारने के लिए उनके निष्प्राण होठों से रणहुंकार की ध्वनि गूँजती रही। हर साल 12 सिंतबर को सुबह एक धार्मिक सभा आयोजित की जाती है, जबकि शाम को पूर्व सैनिकों का पुनर्मिलन होता है। फिरोजपुर में स्मारक गुरूद्वारा कुल 27118 रुपये की लागत से सेना द्वारा इन बहादूर सैनिकों को सम्मानित करने के लिए बनाया गया था। गुरूद्वारे को 1904 में पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर चार्ल्स पेवज द्वारा खुला घोषित किया गया था।


बरकी मेमोरियल (फिरोज़पुर)

1965 में युद्ध के मैदान में सर्वोच्च बलिदान देने वाले गोल्डन एरो डिवीजन के सैनिकों की स्मृति में 1969 में बरकी मेमोरियल का निर्माण किया गया था। उनके बलिदान ने लाहौर के दक्षिण- पूर्व में 15 मील की दूरी पर स्थित बरकी नामक शहर पर कब्जे का मार्ग प्रशस्त किया। इस स्मारक की आधार शिला लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह, वी आर सी ने 11 सितंबर 1969 को रखी थी और अनावरण समारोह लेफ्टिनेंट जनरल एच के सिब्बल, एम वी सी द्वारा किया गया था। यह स्मारक जो अब सारागढ़ी परिसर का एक हिस्सा है, इसके केन्द्र में एक स्तंभ, एक पैट्टन टैंक, दक्षिण में एक बरकी मील का पत्थर और उत्तर में एक पानी का फव्वारा है। स्तंभ 27 फीट ऊँचा और लाल व सफेद बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट से बना है। स्तंभ पर मोल्डिंग और प्रमुख नक्काशी प्राचीन भारतीय वास्तु शैली की है। फव्वारा प्रतीकात्मक रूप से उन शहीदों की स्मृति को दर्शाता है, जिन्होंने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।


सहजरा मेमोरियल (फिरोज़पुर)

पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध के दौरान गोल्डन एरो डिवीजन द्वारा सहजरा पर कब्जा करने की स्मृति में फिरोजपुर में सहजरा स्मारक का निर्माण किया गया। 04 दिसम्बर 1971 को 48 इन्फैन्ट्री ब्रिगेड को सहजरा पर कब्जा करने एवं खेमकरण सैक्टर में दुश्मन को मेंहदीपुर-सहजरा से रोकने का आदेश दिया गया था। 1971 के युद्ध के दौरान सहजरा को गोल्डन एरो डिवीजन के सर्वप्रथम आक्रामक कार्य के रुप में निर्धारित किया गया था। सभी बाधाओं को पार करते हुए इस कार्य को सफल अंजाम दिया गया और 82 युद्ध-बंदियों के अलावा, चार 7 पाऊंडर एंटी-टैंक गन, दो 106 मी. मी. आर सी एल गन, चार 3 ईंच मोर्टार, 18 मीडियम मशीन गन और 132 राइफलों सहित 17 सैन्य वाहन पकड़े गए। बारीकी से तैयार किया गया खाका और सटीक रुप से निष्पादित ऑपरेशन के लिए फॉर्मेशन को युद्ध सम्मान ‘सेहजरा’ से सम्मानित किया गया और छह वीर चक्र और छह सेना पदक प्रदान किए गए।


युद्ध स्मारक : VI किंग एडवर्ड ओन कैवलरी (फिरोजपुर)

इस स्मारक का निर्माण भारतीय अधिकारियों और VI किंग एडवर्डस ओन कैवलरी के सैनिकों की याद में किया गया था, जिन्होंने 1914-18 के विश्व युद्ध के दौरान अपने प्राणों की आहूति दी थी । इसका निर्माण लाल पत्थर और सीमेंट की सामग्री से किया गया है, जिसमें सभी दुर्घटनावश मारे गए/ लापता/ मारे गए / घाव या बीमारी से हताहत कर्मियों के नाम उकेरे गए हैं। यह फिरोजपुर में गोल्डन एरो हॉऊस क्रॉसिंग पर स्थित है।


टाइगर युद्ध स्मारक (जम्मू)

टाइगर वॉर मेमोरियल जम्मू की सतवारी छावनी में झुरमुर टीसीपी गेट के पास स्थित है। इसका निर्माण 1989 में 104 ईंजीनियर रेजिमेंट द्वारा किया गया था और यह टाइगर डिवीजन के बहादूर और वीर सैनिकों को समर्पित है जिन्होंने अपने देश की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।


बलिदान स्तम्भ (जम्मू)

जम्मू के बहू वाली रख में स्थित स्मारक का निर्माण जम्मू-कश्मीर के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाले सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस और नागरिकों की याद में किया गया है। स्मारक में एक शानदार मीनार है जिसमें एक अखण्ड ज्वाला है और यह जल निकायों से घिरी हुई है। राष्ट्रीय, ऐतिहासिक और सैन्य महत्त्व के सभी समारोहों के आयोजन हेतु एक सम्मानित स्थल होने के अतिरिक्त युद्ध स्मारक की परिकल्पना, सैन्य-नागरिक सदभाव, मान्यता और सम्मान के एक सेतु के रूप में की जाती है। 2003 में तत्कानील सेनाध्यक्ष, जनरल ऐन सी विज, पी वी एस एम, यू वाई एस एम, ए वी एस एम, ए डी सी तथा जम्मू-कश्मीर के माननीय मुख्यमंत्री द्वारा इस परियोजना का उदघाटन किया गया था। यह एक विशाल संरचना है जो जम्मू शहर के अधिकांश हिस्सों से दिखाई देती है।


ब्लैक एलिफेंट डिवीजन स्मारक (पटियाला)

ब्लैक एलिफेंट डिवीजन की स्थापना 01 सितम्बर 1940 को हुई थी और यह भारतीय सेना का गौरव है। गत वर्षों में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, 1948 में हैदराबाद, 1965 का भारत-पाक युद्ध अथवा 1993 व 2004 के दौरान पटियाला जिले में बाढ़ राहत कार्यों के दौरान डिवीजन ने अपना लोहा मनवाया है। नागरिक सैन्य संपर्क को बढ़ाने की दिशा में काफी समय से पटियाला स्टेट फोर्स मेमोरियल और ब्लैक एलीफेंट डिवीजन मेमोरियल को स्थानान्तरित करने की तीव्र इच्छा व्यक्त की जा रही थी। इसी दौरान ‘स्मारक’ के मूल विचार और अवधारणा की कल्पना की गई थी ,जिसका अर्थ है “युद्ध में मारे गए सैनिकों की याद में एक स्मारक का निर्माण जो कहीं ओर दफन किये गए थे।” सितंबर 2005 में ब्लैक एलीफेंट वॉर मेमोरियल (स्मारक ) को पटियाला स्टेट फोर्सेज मेमोरियल के साथ सह-स्थापित किया गया था।


पंजाब स्टेट वॉर मेमोरियल ( पंजाब राज्य युद्ध स्मारक)

पंजाब राज्य युद्ध स्मारक की परिकल्पना न केवल पंजाब राज्य के शहीदों की स्मृति में एक स्मारक के रुप में की गई थी, बल्कि बौद्धिक गतिविधियों के लिए सुविधाएं प्रदान करने के लिए भी की गई थी। मेमोरियल के केन्द्रीय स्मारक में सफेद संगमरमर में 50 फीट ऊँचा स्मारक स्तंभ और षट्कोणीय प्लेटफॉर्म पर लाल बलुआ पत्थर जड़े हैं जिसके अन्दर जांलधर जिले के सभी गांवो से एकत्रित पवित्र मिट्टी रखी गई थी। षटकोणीय उभरे हुए मंच के किनारों पर 1947 से वीरता पुरस्कार विजेताओं के नाम काले ग्रेनाईट पत्थर पर उकेरे गए हैं। इस वेदी के चारों ओर लाल बलुआ पत्थर का एक मंच प्रदान किया गया है। स्मारक स्वतंत्र रुप से बलिदान और गौरव के प्रतीक के रुप में खड़ा है। युद्ध नायकों को श्रद्धांजलि देने हेतु हर वर्ष युद्ध स्मारक परिसर में वार्षिक सशस्त्र सेना झंडा दिवस समारोह आयोजित किया जाता है।


 

प्ररेणा स्थल (क्लीमेंट टाऊन)

देश के लिए हमारे शहीदों के सर्वोच्च बलिदान को सम्मानित करने हेतु, कला ग्रांउड में ‘प्रेरणा स्थल’ युद्ध स्मारक का निर्माण किया गया था और इसका उदघाटन 16 मई 2015 को हुआ था। स्मारक, संयुक्त सेवा विंग (जे एस डब्ल्यू) के विविध इतिहास का प्रमाण है, जो क्लीमेंट टाऊन में स्थापित किया गया था। कला ग्राउंड, इसका सिगनेचर मास्ट धारण किए हुए जे एस डब्ल्यू का ड्रिल स्क्ववेयर हुआ करता था, को वर्तमान में गैरीसन हेतु ड्रिल स्क्ववेयर के रुप में अच्छी तरह से अनुरक्षित रखा गया है। जे एस विंग के पूर्ववर्ती क्वार्टर डेक को दोहराने के लिए 46 फीट का फ्लैग मास्ट लगाकर मैदान/ग्राउंड को उसके पूर्व गौरव में वापिस लाया गया है। देश की सेवा में अपने प्राणों की आहूती देने वाले शहीदों को याद करने के लिए क्षेत्र के एक छौर को स्मारक में बदल दिया गया है।